उत्तराखंड: 154.58 किलोमीटर की टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन के फाइनल लोकेशन सर्वे को मंजूरी

देहरादून: (देवभूमि जनसंवाद न्यूज़) बागेश्वर, रेल मंत्रालय ने टनकपुर-बागेश्वर नई ब्रॉडगेज रेल लाइन के फाइनल लोकेशन सर्वे को मंजूरी दे दी है। इस पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय रेल मंत्री अश्वनी वैष्णव का आभार जताया।

टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन 154.58 किलोमीटर की है। पिछले दिनों मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे लेकर केंद्रीय रेल मंत्री से मुलाकात की थी। इसके फाइनल लोकेशन सर्वे के लिए 28 करोड़ 95 लाख रुपये के बजट को मंत्रालय ने स्वीकृति दी है। मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि रेल लाइन बनने से क्षेत्र में विकासात्मक गतिविधियां बढे़ंगी।

लोगों को काफी सुविधा मिलेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्तराखंड से विशेष लगाव है। उनके कार्यकाल में प्रदेश में तमाम विकास कार्य हुए हैं। विशेष तौर पर कनेक्टिविटी के क्षेत्र में चारधाम सड़क परियोजना, ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल परियोजना, एयर कनेक्टिविटी में ऐतिहासिक काम हुए हैं या चल रहे हैं। इससे आने वाले समय में प्रदेश की आर्थिकी में क्रांतिकारी परिवर्तन आएंगे।

एक सदी से सर्वे के फेर में फंसी रही टनकपुर-बागेश्वर रेललाइन
बागेश्वर रेललाइन 109 साल से सर्वे में ही उलझी है। एक सदी की लंबी अवधि के दौरान 24 फरवरी 1960 को पिथौरागढ़, 15 सितंबर 1997 को बागेश्वर और चंपावत अल्मोड़ा से अलग होकर जिले बन गए लेकिन 109 वर्ष बीतने के बाद भी रेल लाइन एक सपना ही है। तीन जिलों को जोड़ने वाली सामरिक महत्व की यह प्रस्तावित रेल लाइन सर्वे तक ही अटक कर रह गई है। नवंबर 2020 में दूसरी बार रेल लाइन के लिए रेल मंत्रालय ने सर्वे कराया। 

वर्ष 1911-12 में अंग्रेजी हुकूमत ने टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन का सर्वे कराया था। रेल लाइन निर्माण का खाका अंग्रेज तैयार कर रहे थे कि आजादी की ज्वाला और तेज भड़कने लगी। अंग्रेज बागेश्वर तक रेल नहीं पहुंचा पाए। देश की आजादी के बाद बागेश्वर के लोगों ने रेल लाइन के निर्माण की मांग उठानी शुरू कर दी थी। 80 के दशक में यह मांग परवान चढ़ी। बागेश्वर से लेकर पिथौरागढ़, चंपावत इलाके के लोग रेल लाइन निर्माण की मांग को लेकर लामबंद होने लगे। जनांदोलनों के पुरोधा बागेश्वर निवासी गुसाईं सिंह दफौटी के नेतृत्व में हुए आंदोलन ने शासकों की चूलें हिला दी थीं। आंदोलन ने सत्ताधारी दल के साथ ही विपक्षी दलों को भी आंदोलन का समर्थन करने के लिए मजबूर कर दिया।

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