भाजपा भी दे रही परिवारवाद को बढ़ावा, कैंट सीट पर छात्रवृत्ति घोटाले के आरोपी कपूर परिवार को टिकट! विरोध के स्वर हुए मुखर गरीब छात्रों का पैसा हड़प कर बेच दिया कालेज, अब भाजपा के टिकट पर विधायक बनने का सपना, पार्टी के अंदर विरोध के स्वर हुए मुखर

भाजपा आलाकमान जनता की सहानुभूति बटोरने के लिए कपूर परिवार को उतारना चाहता है चुनाव मैदान में

क्या इस बार भ्रष्टाचार औऱ परिवारवाद की लड़ाई में कांग्रेस कैंट से बाजी मार जाएगी?

देहरादून : (देवभूमि जनसंवाद न्यूज़) करोड़ों रुपये के छात्रवृत्ति घोटाले में शामिल पूर्व विधायक हरबंश कपूर की पत्नी सविता कपूर और बेटा अमित कपूर इस बार गढ़ी कैंट से भाजपा टिकट के दावेदार हैं। दोनों मां-बेटे विहाइब कालेज के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष रहे हैं। यह कालेज छात्रवृत्ति घोटाले में शामिल रहा और इस मामले में सहसपुर थाने में केस दर्ज है। अमित कपूर को हाईकोर्ट से भी राहत नहीं मिली और अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है। इसकी सुनवाई 20 जनवरी को होनी है। कपूर परिवार ने विवादों के बाद गैरकानूनी तरीके से बिहाइव कालेज को बेच दिया।

भाजपा की गढ़ी कैंट सीट पर सविता कपूर को प्रबल दावेदार माना जा रहा है। भाजपा में भी इसका घोर विरोध हो रहा है। विपक्ष का कहना है कि क्या भाजपा भी परिवारवाद को बढ़ावा दे रही है? उनके सवाल हैं कि छात्रवृत्ति घोटाले के कलंक को कपूर खानदान कैसे मिटाएगा? गरीबों के पैसों का हिसाब कौन देगा? कपूर द्वारा कमाई गयी बेहिसाब संपत्ति का हिसाब कौन देगा? हरबंस कपूर ने 40 साल में अपना निजी कालेज बनाया, फ्लैट्स बनाए, दुकानें खरीदी-बेची, कॉलेज की सरकारी जमीनों पर कब्जा करवाने के इल्जाम भी लगे, लेकिन कैंट क्षेत्र के लिए क्या किया? क्या गढ़ी कैंट कपूर खानदान की बपौती है कि हर बार टिकट उन्हें ही दिया जाएं।

हरबंश कपूर के निधन के बाद आखिर उनके परिजनों को टिकट क्यों दिया जाए जबकि उनका राजनीति में कोई योगदान नहीं है। महज इसलिए कि पूर्व विधायक हरबंस कपूर की विधवा हैं या बेटा है। भाजपा हरबंस कपूर के निधन के बाद जनता की सहानुभूति बटोरने के लिए सविता को चुनाव मैदान में उतारना चाहती है लेकिन हरबंस कपूर अपनी पूरी जिन्दगी जी कर गये। विधानसभा चुनाव में सहानुभूति लहर का सवाल ही नहीं होता। पार्टी के अंदर से भी सवाल हैं कि क्या भाजपा के कुंवर जपेंदर, विनय गोयल, जोगेंद्र पुंडीर या आदित्य चौहान केवल दरी बिछाने या भाजपा का झंडा उठाने का ही काम करेंगे? यहां वर्षों से पार्टी के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं और अन्य नेताओं के लिए कौन सोचेगा? क्या इस बार परिवारवाद की लड़ाई में विपक्ष कैंट से बाजी मार जाएगी? क्या सिर्फ संवेदना के नाम पर टिकट बांटना भाजपा को बेशक फायदा पहुंचाए पर क्या जनता को फायदा पहुंचाएगा? ये सवाल आपके लिए छोड़े चलते हैं।

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