पांच करोड़ का कारोबार और टैक्स गायब

देहरादून। स्टेट जीएसटी की टीम ने पहले ऐसे प्रकरण का खुलासा किया है, जिसमें हरिद्वार में एक फर्जी फर्म ने पांच करोड़ रुपये का कारोबार कर डाला और इसमें 80 लाख रुपये का टैक्स पचा लिया। फर्म भी 30 साल पहले मर चुके व्यक्ति के नाम पर किरायानामा बनाकर खोली गई। राज्य माल और सेवा कर (स्टेट जीएसटी) विभाग ने तत्काल प्रभाव से फर्जी फर्म का पंजीकरण निरस्त करने की कार्रवाई शुरू करते हुए उसके खिलाफ मंगलौर कोतवाली में मुकदमा दर्ज करा दिया है। हरिद्वार के नारसन कला (रुड़की) में सर्वश्री बालाजी ट्रेडर्स ने मई 2019 में पंजीकरण के बाद एक माह के भीतर ही पांच करोड़ रुपये के आयरन स्टील की खरीद-बिक्री के ई-वे बिल बना डाले। यानी इतने कम समय में यह कारोबार कर लिया गया। इस पर संदेह होने पर स्टेट जीएसटी के अपर आयुक्त राकेश टंडन ने फर्म के स्थलीय निरीक्षण के निर्देश दिए। विभाग के विशेष कार्यबल (एसटीएफ) के संयुक्त आयुक्त एनसी जोशी के नेतृत्व में जब फर्म की जांच की गई तो पता चला कि हकीकत में ऐसी कोई फर्म ही नहीं है। क्योंकि फर्म का पंजीकरण बलबीर नाम के ऐसे व्यक्ति के नाम पर किरायेनामे के आधार पर किया गया, जिसकी मृत्यु 30 साल पहले हो चुकी है। मौके पर भी किसी भी तरह के कारोबार के प्रमाण नहीं मिले और वहां बलबीर का परिवार निवास करता है। वहीं, भूस्वामी के रूप में बलबीर के पुत्र धर्मपाल का नाम दर्ज है और उनकी भी मृत्यु दो साल पहले हो चुकी है। संयुक्त आयुक्त एनसी जोशी के निर्देश पर फर्म स्वामी सुरेश चंद पुत्र सुंदर पाल निवासी आवास विकास सिकंदराबाद, आगरा (उत्तर प्रदेश) के खिलाफ मंगलौर कोतवाली में मुकदमा दर्ज कर दिया गया है। वहीं, यह पता करने के प्रयास किए जा रहे हैं कि इस फर्जी फर्म से माल की आपूर्ति किसे की गई। क्योंकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि माल की आपूर्ति भी फर्जी फर्म के नाम पर कहीं अन्यत्र न की गई हो। स्टेट जीएसटी के संयुक्त आयुक्त के मुताबिक किरायेनामे पर लगाई गई नोटरी की मुहर संदिग्ध प्रतीत होती है। पुलिस ने इसकी भी जांच शुरू कर दी है। वहीं, फर्म स्वामी के आगरा स्थित पते पर भी नोटिस भेज दिया गया है। बहुत संभव है कि यह पता भी फर्जी हो। कागजों में तो फर्जी फर्म कारोबार करती दिखती हैं, मगर न ही वह हकीकत में माल प्राप्त करती हैं, न ही वहां से आपूर्ति की जाती है। इसके लिए ऐसी फर्में अपंजीकृत कारोबारियों से माल खरीदती हैं, जिनका जीएसटी विभाग के पास कोई रिकॉर्ड नहीं होता है। इस तरह कई दफा अपंजीकृत फर्म से खरीदे गए माल को प्राप्त करने वाली फर्म भी वास्तविक नहीं होती है और अधिकारियों को गच्चा देने के लिए फर्जी फर्मों की पूरी चेन काम करती है। यह आपस में ही ट्रांजेक्शन कर पूरे मामले को उलझा देती हैं। फिर मौका पाकर माल को पार करा दिया जाता है।

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