सत्गुरू के बिना ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति सम्भव नहीं

देहरादून। गुरू के बिना ब्रह्मज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। गुरू के बिना मानव अपने कीमती जीवन को गवाकर ऐसे ही जीवन जीता चला जाता है। सत्य की जानकारी जिसे हम ईश्वर, निरांकर, गाॅड, वाहेगुरू आदि नामों से पुकराते है, इसी सच्चे सौदे की सबको जरूरत होती है। सत्गुरू ब्रह्मज्ञान के साथ बोलचाल एवं व्यवहार में प्यार व नम्रता का भाव सिखाते है, जिससे जीवन सरल हो जाता है। कठोरता आग के समान जलाने वाली और पीड़ा देने वाली होती है जबकि नम्रता मिठास देती है। उक्त आशय के उदगार संत निरंकारी भवन, हरिद्वार बाइपास में रविवार को आयोजित सत्संग कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए स्थानीय ज्ञान प्रचारक सुशीला रावत ने व्यक्त किये। उन्होंने सत्गुरू माता सुदीक्षा सविन्दर हरदेव जी के पावन सन्देश को देते हुए आगे कहा कि सत्संग में नित्य प्रतिदिन आने से ब्रह्मज्ञान ईश्वर से हमारा नाता जुड़ता है और विश्वास पक्का होता है। गुरू का यशोगान करने से सुकराने की भावना निकलती है और हमारे मनों के विकार दूर होते है। हमारा जीवन मन-वचन-कर्म से एक हो जाये, तो हमारे जीवन का कल्याण सम्भव है। मनुष्य परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ रचना है। इसकी श्रेष्ठता इसके रूप से नहीं बल्कि मनुष्य रूप में इस जीवन के मुख्य लक्ष्य की प्राप्ति से है। जो अपने जीवन में इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है, उसी के जीवन में शान्ति है। वह स्वयं भी शान्त रहता है और इस संसार में भी शान्ति को फैलाने का कार्य करता है। संत निरंकारी मिशन का उदेद्श्य ही है कि आध्यात्मिक जाग्रति के माध्यम से संसार में शान्ति को फैलाना है। वास्तविक ज्ञान के अभाव में, हर किसी के लिए ईश्वर अलग-अलग है, जो भिन्न-भिन्न अवसरों पर एक ही व्यक्ति के लिए भी अलग-अलग है। परन्तु सत्गुरू ब्रह्मज्ञान से जोड़कर सबको एक परमात्मा निराकार के दर्शन कराता है। सत्गुरू हमें ऐसी दृष्टि प्रदान करता है कि हर एक मानव में परमात्मा का अंश दिखाई देने लगता है। आज इस सत्संग कार्यक्रम में अनेकों सन्तों ने गीतों एवं विचार के माध्यम से गुरू की महिमा का बखान किया। मंच संचालन बहन पम्पी ने किया। 

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