उत्तराखंड: 17 साल से सलाखों के पीछे कैद है ‘टीटू’, मां थी नरभक्षी.. बेटे की जन्म लेते ही छिन गई जंगल की आजादी

अल्मोड़ा: जंगल उसका घर था, आजादी उसका अधिकार थी, लेकिन किस्मत ने उसके हिस्से में कैद की जिंदगी लिख दी। उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थित ट्रांजिट रेस्क्यू सेंटर में रहने वाला गुलदार ‘टीटू’ पिछले 17 वर्षों से सलाखों के पीछे जिंदगी गुजार रहा है। हैरानी की बात यह है कि उसने न कभी किसी इंसान पर हमला किया और न ही किसी तरह का खतरा पैदा किया, फिर भी वह आज तक जंगल की खुली दुनिया नहीं देख पाया।

टीटू की कहानी आज रेस्क्यू सेंटर आने वाले हर पर्यटक को भावुक कर देती है। उसकी मासूम आंखों में कैद जिंदगी का दर्द साफ नजर आता है, जिसे देखकर हर कोई सोचने पर मजबूर हो जाता है कि आखिर उसका कसूर क्या था? टीटू की कहानी वर्ष 2009 से शुरू होती है। 29 सितंबर 2009 को पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र से एक नरभक्षी मादा गुलदार को रेस्क्यू कर अल्मोड़ा ट्रांजिट रेस्क्यू सेंटर लाया गया था। वन विभाग ने उसका नाम ‘नंदिता’ रखा। रेस्क्यू सेंटर पहुंचने के कुछ दिनों बाद, 12 अक्टूबर 2009 को नंदिता ने एक स्वस्थ नर शावक को जन्म दिया। यही शावक आगे चलकर ‘टीटू’ के नाम से जाना गया।

तीन महीने की उम्र में सिर से उठ गया मां का साया

जन्म के बाद टीटू सामान्य शावकों की तरह चंचल और सक्रिय था। लेकिन उसकी जिंदगी में बड़ा दुख तब आया जब मात्र तीन-चार महीने की उम्र में उसकी मां नंदिता की मौत हो गई। मां की मौत के बाद टीटू पूरी तरह अकेला पड़ गया। ऐसे में वन विभाग के कर्मचारियों ने उसकी जिम्मेदारी संभाली। जू कर्मियों ने निप्पल से दूध पिलाकर और विशेष देखभाल कर उसे बड़ा किया। आज भी टीटू उन कर्मचारियों को उनकी आवाज से पहचान लेता है, जिन्होंने उसे बचपन में पाला था। यही भावनात्मक जुड़ाव उसकी कहानी को और भी खास बना देता है।

जंगल देखा ही नहीं, इसलिए नहीं मिल सकती आजादी

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार टीटू कभी प्राकृतिक जंगलों में नहीं रहा। उसने अपनी पूरी जिंदगी इंसानों की देखरेख में बिताई है। अधिकारियों का कहना है कि यदि उसकी मां जीवित रहती तो वह जंगल में रहने, शिकार करने और खुद को सुरक्षित रखने के गुर सीख जाता। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक टीटू को अब जंगल में छोड़ना उसके लिए खतरनाक साबित हो सकता है। वह शिकार करना नहीं जानता और जंगल की परिस्थितियों में खुद को ढाल नहीं पाएगा।

आज अल्मोड़ा ट्रांजिट रेस्क्यू सेंटर आने वाले अधिकांश पर्यटक टीटू को देखने जरूर पहुंचते हैं। उसकी कहानी सुनकर लोग भावुक हो जाते हैं और उसकी तस्वीरें अपने कैमरों में कैद करते हैं। वन विभाग के कर्मचारियों के अनुसार टीटू अब उम्रदराज हो चुका है और संभवतः उसका शेष जीवन भी रेस्क्यू सेंटर में ही बीतेगा। आगे पढ़िए..

शेरू, डोली, गोपी और मालती भी हैं सेंटर की पहचान

टीटू के अलावा रेस्क्यू सेंटर में कई अन्य गुलदार भी मौजूद हैं, जो पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। इनमें शेरू, डोली, गोपी और मालती प्रमुख हैं। शेरू को वर्ष 2013 में घायल और नरभक्षी अवस्था में रेस्क्यू किया गया था, जबकि डोली को वर्ष 2024 में डीडीहाट क्षेत्र से लाया गया। गोपी और मालती को वर्ष 2017 में अल्मोड़ा के गधोली गांव से रेस्क्यू किया गया था।

क्या कभी मिलेगी टीटू को आजादी?

वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि अब टीटू को जंगल में छोड़ना उसके जीवन के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। लंबे समय से रेस्क्यू सेंटर में रहने के कारण वह पूरी तरह मानव देखरेख का आदी हो चुका है। ऐसे में उसकी सुरक्षा और जीवन को देखते हुए उसे रेस्क्यू सेंटर में ही रखा जाना सबसे सुरक्षित विकल्प माना जा रहा है।

मां के गुनाह की सजा भुगत रहा टीटू

टीटू की कहानी सिर्फ एक गुलदार की कहानी नहीं, बल्कि उस विडंबना की कहानी है जिसमें एक बेजुबान जानवर अपनी पूरी जिंदगी ऐसी कैद में बिताने को मजबूर है, जिसके लिए वह खुद कभी जिम्मेदार नहीं था। उसने न जंगल में शिकार किया, न किसी इंसान को नुकसान पहुंचाया, लेकिन फिर भी आजादी उसके हिस्से में कभी नहीं आई। शायद यही वजह है कि टीटू की कहानी सुनने वाला हर व्यक्ति एक बार जरूर सोचता है—क्या सचमुच वह सिर्फ अपनी मां के गुनाह की सजा भुगत रहा है?

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