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देहरादून : विकास के साथ-साथ देश को सामरिक महत्व के कार्यों में बढ़त तो दिला रही हैं उच्च हिमालयी क्षेत्र में बनाई जा रही सड़कें सीमांत पर इन सड़कों के निर्माण से हिमालय के सबसे दुर्गम ट्रैक अपना अस्तित्व खो रहे हैं। कुमाऊं मंडल में मिलम, पंचाचूली, कैलाश मानसरोवर और पिंडारी ग्लेशियर सड़कों के नीचे दबकर अपना वजूद खो रहे हैं। 40 से 100 किमी तक लंबे इन ट्रैकों पर कहीं पूरी सड़कें बिछ चुकी हैं तो कहीं बिछाई जा रही हैं।उच्च हिमालय क्षेत्रों की इन पैदल पगडंडियों के सहारे ही भारत-चीन के बीच परंपरागत सीमा व्यापार हुआ करता था।
इसके अलावा ये पगडंडियां साहसिक पर्यटन के शौकीनों को ट्रैकिंग के लिए भी आकर्षित करती रहीं। चार से पांच हजार मीटर तक की ऊंचाई पर जाने वाले इन ट्रैकों पर काली और गोरी नदी ने साहसिक पर्यटन के शौकीनों की परीक्षा लेने के साथ ही रोमांच को भी बढ़ाया है। लेकिन बीते सालों में इन ट्रैकों पर तेजी से कंक्रीट बिछ गया है। 61 किमी के मिलम ट्रैक पर करीब 35 किमी सड़क बन चुकी है। 42 किमी का पंचाचूली ट्रैक लगभग खत्म हो चुका है। 45 किमी के पिंडारी ट्रैक पर 30 किमी तक सड़क बन चुकी है। आदि कैलाश का ट्रैक भी पूरी तरह खत्म चुका है।
सीमांत इलाकों तक सड़कों का नर्मिाण दरअसल दुर्गम ट्रैकों के रास्तों पर ही हुआ है। इस कारण उच्च हिमालयी क्षेत्र के चार रोमांचकारी ट्रैक तो पूरी तरह खत्म हो गए हैं। पर्यटक एवं अन्य लोग भी अब वाहनों में बैठकर इन इलाकों तक पहुंच रहे हैं। नतीजतन, अब इन रास्तों पर ट्रैकिंग भी लगभग बंद हो गई है।
गिरधर मनराल, मंडलीय साहसिक पर्यटन अधिकारी, केएमवीएनअस्तित्व खोते ट्रैक
मिलम ट्रैक: चार हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थिति मिलम ट्रैक 52 किलोमीटर लंबा था। अब इस ट्रैक पर मात्र 23 किमी ही पैदल मार्ग बचा है।पंचाचूली ट्रैक : 42 किलोमीटर का पैदल ट्रैक था, जो दर से शुरू होता था। यह अब सिर्फ 2 किलोमीटर का रह गया है।
पिंडारी ट्रैक: 45 किमी का ट्रैक था, जो सौंग से शुरू होता था। अब यहां 30 किमी तक सड़क बन चुकी है। आदि कैलाश समुद्र तट से करीब पांच हजार मीटर की ऊंचाई पर है। यहां पहुंचने के लिए 105 किमी की पैदल यात्रा करनी पड़ती थी। अब ये पूरी तरह खत्म हो चुका है।

