क्या है नवादा चर्चित मित्तल भट्टा, कब टूटेगी जिला प्रशासन और राजस्व‌ विभाग की कुम्भकरणी नींद


देहरादून, (देवभूमि जनसंवाद न्यूज़) एक ओर सर्वोच्च न्यायालय और केन्द्र सरकार न्यायालयों में विवादों के लगे अम्बार को लेकर चिंतित हैं वहीं दूसरी ओर उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में शासन प्रशासन की अकर्मण्यता और उदासीनता से नये नये विवादों में अकारण ही जनता उलझती जा रही है और जमीनों से सम्बंधित मुकदमों की संख्या में निरन्तर इजाफा हो रहा है। क्या इन मामलों में सार्थक भूमिका निभा सकते वाले राजस्व विभाग और जिला प्रशासन को कुछ कारगर कदम नहीं उठाया जाना चाहिए? क्या इस तरह के अवैध कारोबार पर कार्यवाही करते हुए भू माफियाओं पर शिकंजा स्व‌संज्ञान लेते हुए नहीं कसा जाना चाहिए? ऐसा ही कुम्भकरणी नींद‌ और जनता लुटती है तो लुटने‌ दो का मामला विगत काफी दिनों से चर्चा में है किन्तु विवादित जमीनों की अवैध बिक्री पर कोई भी एक्शन नजर नहीं आ रहा है परिणामस्वरूप अब इन अवैध व अनुचित बड़े-बड़े पंजीकृत बिक्रयपत्रों के उपरांत भू-माफिया अब इनके दाखिल खारिज कराने की फिराक में है‌ ताकि भोले-भाले पहाड़वासियों को जो एक छोटे से आशियाने के लिए भूमि की तलाश में हों को गुमराह कर विवादित भूमि भिड़ाई जा सके!

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार तहसील सदर क्षेत्र अंतर्गत नवादा कूटला स्थित चर्चित‌ व विवादित मित्तल भट्टे पर कुछ भू-माफिया अवैध प्लाटिंग करने से बाज नहीं आ रहे हैं‌ और निरंतर भोले-भाले पहाड़वासियों को अपनी चतुराई व‌ धूर्तता से बाज नहीं आ रहे हैं। यही नहीं एमडीडीए द्वारा भी इस अवैध प्लाटिंग के विरुद्ध मौके पर चेतावनी स्वरूप बोर्ड भी लगाया जा चुका है ताकि लोग इन भूमाफियाओं के झांसे में ना आयें। ज्ञात हो कि उक्त कृषि व शैक्षणिक भू-उपयोग वाली भूमि को आवासीय जमीन बताकर इन भूमाफियाओं के संगठित गिरोह के द्वारा गुमराह व भ्रमित कर अपने मायाजाल में फंसाने पर तुले हुए हैं।ज्ञात हुआ है कि मित्तल भट्टे की विवादित स्वयं भू मालिकाना हक बताने वाले एक मित्तल बंधु द्वारा किसी शिवराज सिंह को खिलाफ कानून लगभग दस बीघा जमीन बिक्रय की गयी जिसके दाखिल खारिज हेतु मौजा नवादा सवालखानी संख्या 4347 एवं 1657/2023 की वाद पत्रावली तहसील (सदर) में विचाराधीन है। बताया जा रहा है कि जब उक्त भूमि का स्वामित्व ही अनेकों विवादों में विभिन्न न्यायालयों में विचाराधीन है तो किसी एक के द्वारा अपने आपको स्वामी बताकर बेची गयी जमीन का दाखिल खारिज करके भोले-भाले लोगों को गुमराह कर लूट-खसोट करने का अवसर तहसील कैसे प्रदान कर सकता है? यहां यह भी उल्लेख करना आवश्यक होगा कि स्वर्गीय मित्तल बंधु की तथाकथित इस 90-95 बीघा जमीन पर अनेकों वारिस अपने अपने हक की लड़ाई न्यायालयों में लड़ रहे हैं तथा जमीदारी विनाश अधिनियम 1950 की तलवार भी नियमानुसार कभी भी उसके अनुपालन में चल सकती है हालांकि राजस्व विभाग की उदासीनता भी इस आवश्यक कार्यवाही में अनुचित लाभ पहुंचाने की दिशा में उदासीन नजर आ रही है किन्तु यह गाज किसी समय कठोर और दबंग शासक और प्रशासक/अधिकारी के आते ही गिर सकती है और तब 65 बीघा से अधिक समस्त भूमि राज्य सरकार में स्वत: ही निहित हो जायेगी? क्या राजस्व विभाग और जिला प्रशासन किसी सांठ-गांठ के तहत स्वयं भू निष्पक्ष स्वामी को कानून से अधिक भूमि बेंच कर निकल लेने का दे रही है मौका और राज्य सरकार का कर रही भारी नुक्सान !

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